Wednesday, 30 October 2013

हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए -रामनरेश त्रिपाठी


हे प्रभो आनन्ददाता ज्ञान हमको दीजिए 

रामनरेश त्रिपाठी


हे प्रभो! आनन्द दाता ज्ञान हमको दीजिए।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए।
लीजिए हमको शरण में हम सदाचारी बनें।
ब्रह्मचारी धर्मरक्षक वीर व्रत-धारी बनें॥
गत हमारी आयु हो प्रभु! लोक के उपकार में
हाथ डालें हम कभी क्यों भूलकर अपकार में

आर्य- मैथली शरण गुप्त


आर्य

मैथली शरण गुप्त

हम कौन थे,
क्या हो गये हैं,
और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर,
यह समस्याएं सभी

भू लोक का गौरव,
प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां
फैला मनोहर गिरि हिमालय,
और गंगाजल कहां
संपूर्ण देशों से अधिक,
किस देश का उत्कर्ष है
उसका कि जो ऋषि भूमि है,
वह कौन,
भारतवर्ष है

यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है,
इसके निवासी आर्य हैं
विद्या कला कौशल्य सबके,
जो प्रथम आचार्य हैं
संतान उनकी आज यद्यपि,
हम अधोगति में पड़े
पर चिन्ह उनकी उच्चता के,
आज भी कुछ हैं खड़े

वे आर्य ही थे जो कभी,
अपने लिये जीते न थे
वे स्वार्थ रत हो मोह की,
मदिरा कभी पीते न थे
वे मंदिनी तल में,
सुकृति के बीज बोते थे सदा
परदुःख देख दयालुता से,
द्रवित होते थे सदा

संसार के उपकार हित,
जब जन्म लेते थे सभी
निश्चेष्ट हो कर किस तरह से,
बैठ सकते थे कभी
फैला यहीं से ज्ञान का,
आलोक सब संसार में जागी यहीं थी,
जग रही जो ज्योति अब संसार में

वे मोह बंधन मुक्त थे,
स्वच्छंद थे स्वाधीन थे
सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे,
वे शांति शिखरासीन थे
मन से, वचन से, कर्म से,
वे प्रभु भजन में लीन थे
विख्यात ब्रह्मानंद नद के,
वे मनोहर मीन थे

Tuesday, 29 October 2013

भिक्षुक -सूर्य कान्त त्रिपाठी “निराला”



भिक्षुक
(सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला)
वह आता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को- भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता ,
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टीपाने की ओर बढ़ाये
भूख से सूख ओठ जब जाते
दाता भाग्य विधाता से क्या पाते ?
घूँट आँसुओ के पीकर रह जाते
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए

बीती विभावरी जाग री---जयशंकर प्रसाद


बीती विभावरी जाग री !

(जयशंकर प्रसाद)

बीती विभावरी जाग री !
अम्बर पनधट में डुबो रही,
तारा घट उषा नागरी |                                                                             
खग कुलकुल सा बोल रहा,   
किसलय का अंचल डोल रहा, 
लो यह लतिका भी भर लाई,                                                                                             
मधु मुकुल नवल रस गागरी|                                                                                       
अधरों में राग अमंद पिये,
अलको में मलयज बंद किये,                                                                                                            
तू अब तक सोई है आली |
आँखों में भरे विहाग री ?
 
 





 

वर दे वीणावादिनी ---सूर्य कान्त त्रिपाठी “निराला”


वर दे वीणावादिनी


(सूर्य कान्त त्रिपाठी निराला)

वर दे वीणावादिनी वर दे,


प्रिय स्वतंत्ररव,
अम्रत-मंत्र नव भारत में भर दे |
काट अंध उर के बंधनस्तर,
बहा जननि ज्योतिमर्य निर्झर,
कलुषभेदतम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे |
नव गति,नव लय,
ताल छंद नव,
नवल कंठ नव जलदमंद्र रव ,  
व नभ के नव विहग- वृन्द को
नव पर नव स्वर दे |
वर दे वीणावादिनी वर दे |

Saturday, 29 September 2012

ये गजरे तारे वाले--राज कुमार वर्मा


ये गजरे तारे वाले

राज कुमार वर्मा

 

इस सोते संसार बीच,
जग कर सज कर रजनी वाले ,
कहाँ बेचने ले जाती हो ,
ये गजरे तारों वाले ?

मोल करेगा कौन !
सो रही हैं उत्सुक आंखे सारी ,
मत कुम्हलाने दो,
सुनेपन में अपनी निधियाँ न्यारी ׀

निर्झर के निर्मल जल में ,
ये गजरे लहरा कर धोना,
लहर हहर कर यदि चूमे तो ,
किंचित विचलित मत होना  ׀

होने दो प्रतिबिम्ब विचुम्बित ,
लहरो ही में लहराना,
लो मेरे तारों के गजरे,
निर्झर स्वरों में यह गाना ׀

यदि प्रभात तक कोई आकार ,
तुमसे हाय न मोल करे  ,
तो फूलों पर ओसरूप में ,
बिखरा देना सब गजरे ׀ 

खोलो द्वार -- जय शंकर प्रसाद


                            खोलो द्वार 

                          जय शंकर प्रसाद

 

शीशिर कणों से लदी हुई,कमली के भीगें हैं सब तार,

चलता है पशिचम का मारुत,ले कर शीतलता का भार ׀

भीगं रहा है रजनी का वह,सुन्दर कोमल कबरी भार,

अरुण किरण सम कर से छुलो, खोलो प्रियतम खोलो द्वार ׀

 

धूल लगी है,पद काटों से बिधा हुआ है दुःख अपार,

किसी तरह से भुला भटका आ पहुँचा हूँ तेरे द्वार ׀

डरों न इतना,धूल धूसरित होगा नही तुम्हारा द्वार,

धो डाले हैं इनको प्रियवर,इन आँखों से आँसू ढार ׀

 

मेरे धूलि लगे पैरों से,इतना करो न घृणा-प्रकाश,

मेरे ऐसे धूलकणों से कब,तेरे पद को अवकाश ׀

पैरों ही से लिपटा लिपटा कर लूंगा निज पद निधार ,

अब तो छोड़ नही सकता हूँ,पाकर प्राप्य तुम्हारा द्वार ׀

 

सुप्रभात मेरा भी होवे,इस रजनी का दुःख अपार,

मिट जावे, जो तुमको देख,खोलो प्रियतम खोलो द्वार ׀