Tuesday, 13 March 2012

चुनौती


                     चुनौती

है उन्हें मेरी चुनौती,
जो कि मेरे रक्त से श्रृंगार करना चाहते हैं |
वेदना शर्मां रही है देख कर मुस्कान मेरी,
मोम बनती जा रही है,सुन रसीली तान मेरी,
चाँद मेरा मीत है, रवि से नही भयभीत हूँ मै,
वे सुने ललकार मेरी |

जो कि मेरे वक्ष पर अंगार धरना चाहते हैं ,
जो कि मेरे रक्त से श्रृंगार करना चाहते हैं ||
मै जिया उनचास पवनों में प्रलय का गीत बनकर ,
घन घटाओ में रहा हूँ, बिजलियों की जीत बनकर ,
आंधियों के श्याम कुन्तल, प्यार से मैंने सँवारे ,
वे सुने जयघोष मेरा |
व्यर्थ है जो रक्त की नवधार बनाना चाहते हैं ,
जो कि मेरे रक्त से श्रृंगार करना चाहते

Sunday, 11 March 2012

पंचवटी -मैथली शरण गुप्त


पंचवटी

मैथली शरण गुप्त

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!


कारवाँ गुजर गया --गोपालदास नीरज


कारवाँ गुजर गया 

गोपालदास नीरज


स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात पात झर गये कि शाख़ शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क बन गए,
छंद हो दफन गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ धुआँ पहन गये

और हम झुके झुके,
मोड़ पर रुके रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

क्या शबाब था कि फूल फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना सिहर उठा,
इस तरफ ज़मीन उठी तो आसमान उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,

एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली कली कि घुट गयी गली गली,
और हम लुटे लुटे,
वक्त से पिटे पिटे
साँस की शराब का खुमार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।

हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,

वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर बिखर,
और हम डरे डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे!

माँग भर चली कि एक, जब नई नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरन चरन,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
गाज एक वह गिरी,
पुँछ गया सिंदूर तार तार हुई चूनरी,

और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया, गुबार देखते रहे।


जनतंत्र का जन्म -रामधारी सिंह दिनकर


जनतंत्र का जन्म 
रामधारी सिंह दिनकर

सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है,
दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो कि जनता आती है |

जनता? हाँ,
मिट्टी की अबोघ मूरते वही, 
जाडे पाले की कसक सदा सहने वाली,
जब अंग अंग में लगे साँप ही चूस रहे,  
तब भी ,न कभी मुह खोल दर्द कहने वाली ,
लेकिन,होता भूडोल,बवंडर उठते हैं ,
जनता जब कोपाकुल हो भ्रीकुति चढाती है, 
दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो कि जनता आती है |

हुँकारो के महलों की नीव उखड जाती,
सांसो के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह, समय में ताव कहाँ
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है,
सबसे वीराट जनतंत्र जगत का आ पंहूँचा ,
तैंतिस कोटि हित सिंहासन तैयार करो ,
अभिषेक आज राजा का नही,प्रजा  का है,
तैंतिस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो |

आरती लिए किसे तू ढूढता मूरख,
मंदिरों ,राजप्रसादों ,तहखानो में ,
देवता कहीं सड़को पर मिट्टी तोड़ रहे हैं ,
देवता मिलेंगें खेतों में खलिहानो में ,
फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
घुसरता सोने से श्रृंगार सजाती है,
दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंघासन खाली करो कि जनता आती है |


राणा प्रताप की तलवार --श्याम नारायण पाण्डेय


राणा प्रताप की तलवार
श्याम नारायण पाण्डेय

चढ़ चेतक पर तलवार उठा, रखता था भूतल पानी को।
राणा प्रताप सिर काट काट,करता था सफल जवानी को॥

कलकल बहती थी रणगंगा,अरिदल को डूब नहाने को।
तलवार वीर की नाव बनी,चटपट उस पार लगाने को॥

वैरी दल को ललकार गिरी,वह नागिन सी फुफकार गिरी।
था शोर मौत से बचो बचो,तलवार गिरी तलवार गिरी॥

पैदल, हयदल, गजदल में,छप छप करती वह निकल गई।
क्षण कहाँ गई कुछ पता न फिर,देखो चम-चम वह निकल गई॥

क्षण इधर गई क्षण उधर गई,क्षण चढ़ी बाढ़ सी उतर गई।
था प्रलय चमकती जिधर गई,क्षण शोर हो गया किधर गई॥

लहराती थी सिर काट काट,बलखाती थी भू पाट पाट।
बिखराती अवयव बाट बाट,तनती थी लोहू चाट चाट॥

क्षण भीषण हलचल मचा मचा,राणा कर की तलवार बढ़ी।
था शोर रक्त पीने को यह,रण-चंडी जीभ पसार बढ़ी॥

Saturday, 10 March 2012

वेदना का गीत


वेदना का गीत

वेदना का गीत गाकर,
वेदना तुमने बटा ली |
आज अपनी वेदना के,
जब कि मैंने गीत गाये,
मन विपंची के तुम्हारे,
तार भी तन झनझनाए ,
साथ मेरे मंद स्वर में,
तान तुमने भी निकाली
वेदना का गीत गाकर,
वेदना तुमने बटा ली  |

आज अपनी वेदना,
द्रिघ में तुम्हारे छलछलाई,
आह की प्रतिधव्नी तुम्हे छू,
पास मेरे लौट आई,
आज तो मेरे हृदय की,
भावना साकार पाली  
वेदना का गीत गाकर,
वेदना तुमने बटा ली |

प्राण प्राणों से गये मिल,
क्या मिले दो कंठ स्वर के,
प्राण प्राणों में गये घुल,
क्या मिले आतुर अधरकर,
दी बना किसने उजाली ,
आज मेरी रात काली ,
वेदना का गीत गाकर,
वेदना तुमने बटा ली |

जल रहा जिस अग्नि में था,
एक युग से मै निरंतर,
दी बुझा तुमने उसे दो,
बूंद आँसू की गिराकर ,
एक पल पहले जहाँ थे,
साध के दाहक अँगारे,
तुम खड़ी हो उस जगह पर,
दीप आशा के संभारे ,
किन गृहों ने मिला दी,
आज होली से दिवाली  
वेदना का गीत गाकर,
वेदना तुमने बटा ली |




कौन पंहुचा देगा उस पार-महादेवी वर्मा


कौन पंहुचा देगा उस पार

महादेवी वर्मा


घोर तम छाया चारों ओर,घटाएँ घिर आई घनघोर,
वेग मारुत का है प्रतिकूल,हिले जाते हैं पर्वत मूल ,
गरजता सागर बारम्बार,कौन पहुँगा देगा उस पार |

तरंगें उठी पर्वताकार,भयंकर करती हाहाकार,
अरे उनके फेनिल उच्छवास,तरी का करते उपहास,
हाथ से गयी छूट पतवार, कौन पंहुचा देगा उस पार |

ग्रास करने नौका,स्वछंद घूमते जलचर वृन्द,
देख कर काला सिंधु अन्नंत,हो गया साहस  का अन्त,
तरंगें हैं उत्ताल अपार, कौन पंहुचा देगा उस पार |

बुझ गया वह नक्षत्र प्रकाश,चमकती जिसमे मेरी आस,
रैन बोली सज कृषण दुकूल,विसर्जन करेंगे मनोरथ फूल ,
न लाये कोई कर्णाधार, कौन पंहुचा देगा उस पार |

सुना था मेरे इसके पार,बसा है सोने का संसार,
जहाँ के हँसते विहग ललाम,मृत्यु छाया का सुन कर नाम,
धरा का है अन्नंत श्रिंगार, कौन पंहुचा देगा उस पार |

जहाँ के निर्झर नीरव गान,सुना करते अमरत्व प्रदान,
सुनाता नभ अन्नंत झंकार,बजा देता उर के सब तार,
भरा जिसमे असीम सा प्यार, कौन पंहुचा देगा उस पार |

पुष्प में है अन्नंत मुस्कान,त्याग का है मारुत गान,
सभी में है स्वर्गीय विकास,वही कोमल कमनीय प्रकाश ,
दूर कितना है वह संसार , कौन पंहुचा देगा उस पार |

सुनाई किसने पल में आन, कान में मधुमय मोहक तान,
तरी को ले जाओ मझदार,डूब कर हो जाओगे पार,
विसर्जन ही है कर्णाधार, कौन पंहुचा देगा उस पार |