Monday, 9 March 2020

जुही की कली / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला


जुही की कली / सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला
विजन-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहाग-भरी--स्नेह-स्वप्न-मग्न--
अमल-कोमल-तनु तरुणी--जुही की कली,
दृग बन्द किये, शिथिल--पत्रांक में,
वासन्ती निशा थी;
विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़
किसी दूर देश में था पवन
जिसे कहते हैं मलयानिल।
आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात,
आयी याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात,
आयी याद कान्ता की कमनीय गात,
फिर क्या? पवन
उपवन-सर-सरित गहन -गिरि-कानन
कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पार कर
पहुँचा जहाँ उसने की केलि
कली खिली साथ।
सोती थी,
जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह?
नायक ने चूमे कपोल,
डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल।
इस पर भी जागी नहीं,
चूक-क्षमा माँगी नहीं,
निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही--
किंवा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये,
कौन कहे?
निर्दय उस नायक ने
निपट निठुराई की
कि झोंकों की झड़ियों से
सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली,
मसल दिये गोरे कपोल गोल;
चौंक पड़ी युवती--
चकित चितवन निज चारों ओर फेर,
हेर प्यारे को सेज-पास,
नम्र मुख हँसी-खिली,
खेल रंग, प्यारे संग

Friday, 9 August 2019

यह कदम्ब का पेड़ : सुभद्रा कुमारी चौहान



यह कदम्ब का पेड़ : सुभद्रा कुमारी चौहान 

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥
ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली॥
तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता॥
वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता॥
बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता॥
तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे।
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे॥
तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता।
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता॥
तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती।
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं॥
इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे।
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे॥

महादेवी वर्मा: मैं नीर भरी दुख की बदली


 महादेवी वर्मा: मैं नीर भरी दुख की बदली



मैं नीर भरी दुख की बदली! 
स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा
क्रन्दन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झारिणी मचली!
मेरा पग-पग संगीत भरा
श्वासों से स्वप्न-पराग झरा
नभ के नव रंग बुनते दुकूल
छाया में मलय-बयार पली।
मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल
चिन्ता का भार बनी अविरल
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!
पथ को न मलिन करता आना
पथ-चिह्न न दे जाता जाना;
सुधि मेरे आगन की जग में
सुख की सिहरन हो अन्त खिली!
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना, इतिहास यही-
उमड़ी कल थी, मिट आज चली!

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया: सुमित्रानन्द पंत


छोड़ द्रुमों की मृदु छाया:    सुमित्रानन्द पंत 

 छोड़ द्रुमों की मृदु छायातोड़ प्रकृति से भी माया,
 
बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?
 
भूल अभी से इस जग को!  तज कर तरल तरंगों को,
इन्द्रधनुष के रंगों को, तेरे भ्रू भ्रंगों से कैसे बिधवा दूँ निज मृग सा मन?
भूल अभी से इस जग को! कोयल का वह कोमल बोल,
मधुकर की वीणा अनमोल, कह तब तेरे ही प्रिय स्वर से कैसे भर लूँ, सजनि, श्रवण?
भूल अभी से इस जग को! ऊषा-सस्मित किसलय-दल,
सुधा-रश्मि से उतरा जल, ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन?

Saturday, 12 December 2015

वह बुड्ढा



सुमित्रानंदन पंत

खड़ा द्वार पर, लाठी टेके,वह जीवन का बूढ़ा पंजर,

चिमटी उसकी सिकुड़ी चमड़ी,हिलते हड्डी के ढाँचे पर।
उभरी ढीली नसें जाल सी,सूखी ठठरी से हैं लिपटीं,
पतझर में ठूँठे तरु से ज्यों,सूनी अमरबेल हो चिपटी।

उसका लंबा डील डौल है,हट्टी कट्टी काठी चौड़ी,
इस खँडहर में बिजली सी,उन्मत्त जवानी होगी दौड़ी!
बैठी छाती की हड्डी अब,झुकी रीढ़ कमटा सी टेढ़ी,
पिचका पेट, गढ़े कंधों पर,फटी बिबाई से हैं एड़ी।

बैठे, टेक धरती पर माथा,वह सलाम करता है झुककर,
उस धरती से पाँव उठा लेने को जी करता है क्षण भर!
घुटनों से मुड़ उसकी लंबी टाँगें जाँघें सटी परस्पर,
झुका बीच में शीश, झुर्रियों का झाँझर मुख निकला बाहर।

हाथ जोड़, चौड़े पंजों की गुँथी अँगुलियों को कर सन्मुख,
मौन त्रस्त चितवन से,कातर वाणी से वह कहता निज दुख।
गर्मी के दिन, धरे उपरनी सिर पर,लुंगी से ढाँपे तन,
 नंगी देह भरी बालों से,वन मानुस सा लगता वह जन।

भूखा है: 
पैसे पा, कुछ गुनमुना,खड़ा हो, जाता वह घर,
पिछले पैरों के बल उठ जैसे कोई चल रहा जानवर!
काली नारकीय छाया निज छोड़ गया वह मेरे भीतर,
पैशाचिक सा कुछ: दुःखों से,मनुज गया शायद उसमें मर!