Thursday 23 April 2020

दुख मे पलता आया हूँ


दुख मे पलता आया हूँ

दुख मे पलता आया हूँ सुख की मुझको चाह नहीं ,

उसका किंचित अनुभव करलूँ,
 
इसकी भी कुछ परवाह नहीं । 

संश्रित सागर की लहरों पर,

फेंका लघु पुष्प तुम्हारा हूँ 


संघर्षो से तूफानों से टकरा टकरा कर हारा हूँ ।

यह अगम धार कर पार, कभी क्या तेरे सम्मुख आऊँगा?
 
आऊँगा तो उन चरणों मे स्थान प्रभों क्या पाऊँगा ?

दुख मे पलता आया हूँ सुख की मुझको चाह  नहीं ,


Monday 9 March 2020

उस पार:महादेवी वर्मा

उस पार: महादेवी वर्मा

घोर तम छाया चारों ओर, घटायें घिर आईं घन घोर;
वेग मारुत का है प्रतिकूल, हिले जाते हैं पर्वत मूल;
गरजता सागर बारम्बार,कौन पहुँचा देगा उस पार?

तरंगें उठीं पर्वताकार, भयंकर करतीं हाहाकार,
अरे उनके फेनिल उच्छ्वास, तरी का करते हैं उपहास;
हाथ से गयी छूट पतवार,कौन पहुँचा देगा उस पार?

ग्रास करने नौका, स्वच्छ्न्द घूमते फिरते जलचर वॄन्द;
देख कर काला सिन्धु अनन्त हो गया हा साहस का अन्त!
तरंगें हैं उत्ताल अपार,कौन पहुँचा देगा उस पार?

बुझ गया वह नक्षत्र प्रकाश,चमकती जिसमें मेरी आश;
रैन बोली सज कृष्ण दुकूल,विसर्जन करो मनोरथ फूल;
न जाये कोई कर्णाधार,कौन पहुँचा देगा उस पार?

सुना था मैंने इसके पार,बसा है सोने का संसार,
जहाँ के हंसते विहग ललाम,मृत्यु छाया का सुनकर नाम!
धरा का है अनन्त श्रृंगार,कौन पहुँचा देगा उस पार?

जहाँ के निर्झर नीरव गान,सुना करते अमरत्व प्रदान;
सुनाता नभ अनन्त झंकार,बजा देता है सारे तार;
भरा जिसमें असीम सा प्यार,कौन पहुँचा देगा उस पार?

पुष्प में है अनन्त मुस्कान,त्याग का है मारुत में गान;
सभी में है स्वर्गीय विकाश,वही कोमल कमनीय प्रकाश;
दूर कितना है वह संसार! कौन पहुँचा देगा उस पार?

सुनाई किसने पल में आन,कान में मधुमय मोहक तान?
तरी को ले आओ मंझधार,डूब कर हो जाओगे पार;
विसर्जन ही है कर्णाधार,वही पहूँचा देगा उस पार।

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे : सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला


नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे : सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला

नयनों के डोरे लाल-गुलाल भरे, खेली होली !
जागी रात सेज प्रिय पति सँग रति सनेह-रँग घोली,
दीपित दीप, कंज छवि मंजु-मंजु हँस खोली-
                मली मुख-चुम्बन-रोली ।

प्रिय-कर-कठिन-उरोज-परस कस कसक मसक गई चोली,
एक-वसन रह गई मन्द हँस अधर-दशन अनबोली-
                      कली-सी काँटे की तोली ।

मधु-ऋतु-रात,मधुर अधरों की पी मधु सुध-बुध खोली,
खुले अलक, मुँद गए पलक-दल, श्रम-सुख की हद हो ली-
                          बनी रति की छवि भोली ।

बीती रात सुखद बातों में प्रात पवन प्रिय डोली,
उठी सँभाल बाल, मुख-लट,पट, दीप बुझा, हँस बोली
                      रही यह एक ठिठोली ।